Tuesday, 13 June 2017

Book Review: Arranged Marriage

I picked up this book as my third one from the author Chitra Banerjee Divakaruni. I was fantasized by the feeling of reading all her books since the time I finished these exemplary ones- The Mistress of Spices and The Palace of Illusions (which I have reviewed here). But this one broke my heart and shattered my dream of sinking in another supposed great work of hers. This book is a collection of short stories on arranged marriages. But let me...

Monday, 29 May 2017

हीरा

नाज़-ओ-हिफाज़त में थे अपने शहर की गलियों में, तिजोरी में तो सोना भी पीतल हो जाता है, रखे कदम जो चौखट के बाहर तो समझा, तराशे जाने पर तो कोयला भी हीरा बन जाता है...

Friday, 26 May 2017

They say "life is difficult", I ask "compared to what?" -Source unkno...

Wednesday, 24 May 2017

Book Review: A Thousand Splendid Suns

A Thousand Splendid Suns- another marvel from THE Khaled Hosseini. He has inked the inhumane realities of Afghanistan in such a heart warming manner. Before this I have read and reviewed The Kite Runner from the same author, which was so compelling that I bought this one too. And now, I am treasuring his third book, And The Mountains Ecoed as well. The story is a narrative of the struggle of two female protagonists, Mariam and Laila going through...

Wednesday, 17 May 2017

खोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल

छत पर बिछी जब दरी होती थी, चाँद के पार एक परी होती थी, ग़मो की गठरी का बस इतना था बोझ, एक खोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल होती थी, कट्टी और सॉरी का सिलसिला होता हर रोज़, रिश्तों के सौदे कि गुफ़्तगू इतनी सस्ती होती थी, प्रतिस्पर्धा यूँ शुरू और ख़त्म होती थी, जब कागज़ की नाव से रेस दोस्तों संग होती थी, खाली थे हाथ फिर भी ऊँची उड़ान होती थी, जेब में भरी एक रंगीन तितली होती थी, कितनी सरल वो ज़िंदगी होती थी, टूटी गुल्लक से...

Sunday, 14 May 2017

क्या तोहफ़ा दूँ तुम्हें माँ

वो ख़फा़ हो फिर भी दुलार देती है, माँ जुदा हो फिर भी प्यार देती है, हमारी हर भूल को भूला देती है, वो माँ ही है जो हमें रोज़ दुआ देती है | माँ वो है जिसने हमें जीवन दिया है और जिसने अपना जीवन हमें दे दिया है | बहुत विचार किया परन्तु इसके समक्ष कोई भी उपहार तुच्छ प्रतीत हुआ | इसलिए कुछ शब्द ही पिरो दिए इस कविता के रूप में | क्या उपहार दूँ तुम्हें मैं, तुमने जीवन दान दिया हैं माँ। मुस्कान होठों पर सदा सजाये, तुमने...

Monday, 17 April 2017

स्याही

मुद्दतों में उठायी क़लम हाथों में, देख कागज़-ए-ख़ाली हम खो गए, लफ़्ज़ों के आईने में देख ख़ुदा को, ख़ुद ही की मौसीक़ी में मशगूल हो गए | मन में तराशा बिखरे अल्फाज़ो को, कांटे भी फूल हो गए, एक बूंद स्याही गिरी दवात से, छिपे सारे राज़ गुफ़्तगू हो गए ...

Monday, 10 April 2017

मैंने खुशियां ख़रीद ली

शहर की जगमग छोड़ कर मैंने उगते सूरज की रोशनी ख़रीद ली, सिनेमा का विकर्षण छोड़ कर मैने किताब के पन्नो की खुशबू ख़रीद ली | अपेक्षा का आसमान छोड़ कर मैंने प्रतीक्षा की ज़मीं ख़रीद ली, बचपन का दामन छोड़ कर मैंने बचपने की अदाएं समेट ली। रुई का गद्दा त्याग कर मैंने मां की गोद सहज ली, दिन की दौड़ धूप त्याग कर मैंने सांझ की छांव सहज ली | कोलाहल की ध्वनि नकार कर मैंने एक ग़ज़ल ख़रीद ली, मोबाइल पर दौड़ती...

Thursday, 16 March 2017

Book Review: Mrs. Funnybones

This book is written by renowned actress Twinkle Khanna. After digging her luck in diverse fields, she began writing. I am a fan of her newspaper column that comes every Sunday in Times of India, and also her scintillating tweets.I would always admire her for her unconventional sense of humor, presence of mind and stark comments. Also, having traveled many roads of life including acting, interior design and, of course, writing, she carries...

Wednesday, 1 March 2017

Book Review: Band, Baaja, Boys

This a book by author Rachna Singh is a light hearted comedy. The plot is set in Allahabad. And hence, the humour. Rachna singh has brought up the core and basic aspects of the residents as her characters and translated that into humour. The characters are relatable and very usual. The story is about Binny Bajpai - 20 year old daughter of hosiery shop owner Brajesh Bajpai and homemaker Kumud Bajpai. Binny is busy making boyfriends and spending...